Tuesday, 24 March 2015

समाज पर बैन नहीं लग सकता ना!

पिछले कई दिनों से सेंसरशिप को लेकर जो बहस चल रही थी उसमें एक नया अध्याय सुप्रीम कोर्ट के आईटी एक्ट की धारा 66ए को हटाने के साथ ही और जुड़ गया। बेशक ये अच्छा फैसला है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक भी था, क्योंकि अब समाज में अधिकांश बहसें सोशल मीडिया के द्वारा ही होती हैं। ऐसे में बेहद ज़रूरी था कि इंटरनेट के माध्यम से उभर रहे नए आलोचक वर्ग को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त हो। इस फैसले के साथ ही अब तानाशाही मानसिकता के उन लोगों को भी कुछ समझ में तो जरूर आएगा जो शासन सत्ता के हाथ में आते ही खुद को 'खुदा' समझ बैठते हैं।

लेकिन इन सबके बावजूद समाज को और देश में तेजी से उभर रहे बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। क्योंकि जहाँ एक ओर हर चीज को सेंसर करना उचित नहीं है, वहीं दूसरी ओर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर कुछ भी परोसना भी कहीं से ठीक नहीं है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संवैधानिक अधिकार उस जगह आकर ख़त्म हो जाते हैं जहाँ से किसी दूसरे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की शुरुआत होती है। इसीलिए ये ज़रूरी है कि हमें अपनी सीमाओं और नैतिकता का बखूबी ज्ञान हो।

 हाल ही में यूपी के बरेली में एक छात्र को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि कथित तौर पर उसने यूपी के एक 'बेहद' महत्वपूर्ण काबीना मंत्री के ख़िलाफ़ फेसबुक पर कुछ टिप्पणी की थी, अब चूंकि 66ए के तहत गिरफ़्तारी का रास्ता खुला था सो उसे गिरफ्तार कर लिया गया, इसके अलावा असीम त्रिवेदी और बाल ठाकरे के निधन पर मुंबई बंद के खिलाफ टिप्पणी करने वाली छात्राओं समेत कई ऐसे मामले हैं जिनमें समय समय पर लोगों को इस धारा के तहत गिरफ्तार या बेवजह परेशान किया गया।

अब ये धारा नहीं है तो गिरफ्तारियां तो नहीं होंगी, अभिव्यक्ति की आज़ादी भी सुरक्षित रहेगी पर क्या ये अब अराजकता को बढ़ावा नहीं देगा, ये एक दूसरा पहलू हो सकता है। ऐसी स्थिति में समाज को खुद इतना समझदार होना पड़ेगा की वो ये तय करने की स्थिति में हो सके कि क्या सही है और क्या गलत। ऐसा इसलिए क्योंकि जब भी किसी फिल्म या ऐसी ही किसी चीज पर बैन को लेकर याचिका सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में पड़ी, अधिकांश में हर बार कोर्ट ने यही कहा कि समाज खुद समझदार है आप उसे ही तय करने दीजिये कि उसे क्या देखना है और क्या नहीं।

ऐसे में ये साफ़ है कि ज़िम्मेदारी हमारी ही है कि हम किस तरह की सामग्री दुनिया के सामने रख रहे हैं। क्योंकि कुछ भी हो समाज को तो बैन नहीं किया जा सकता ना!


Wednesday, 28 January 2015

एक लड़की के सपने और चुनौतियाँ

गणतन्त्र दिवस के बहाने ही सही पहली बार देश की लड़कियों को अहसास हुआ कि उन्हें समाज में बराबरी का अधिकार सच में प्राप्त है। अभी तक सिर्फ बातें ही हो रही थीं पर जिस तरह प्रधानमंत्री की पहल पर पहली बार देश की सेना की तीनो कमानों से महिला टुकड़ियां शामिल हुईं वह अपने आप में काबिले तारीफ़ है। खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी इस पहल की सराहना की। पहली नज़र में ये सब देख कर कहा जा सकता है कि हाँ देश की बेटियां अब कई मायनों में सशक्त हैं।
अच्छा लगता है जब किसी सरकारी बैंक या दफ्तर में घुसते ही लगभग आधा स्टाफ युवा लड़कियों का होता है। ये सारा माहौल नया है। आज से ज्यादा पीछे नहीं बस 10-15 साल पहले तक हालात ऐसे ना थे। ज़ाहिर है समाज की और खुद लड़कियों की सोच काफी बदली है। अपवादों को छोड़ दें तो समाज अब चाहता है कि लड़कियां आगे बढ़ें, कुछ अच्छा करें। लड़कियों में भी शायद इसी वजह से एक हौसला आया है कि हाँ वो भी कुछ कर सकती हैं।

लेकिन....इन लड़कियों के आगे बढ़ने में कुछ ऐसे अवरोध हैं जिन्हे दूर करना शायद बहुत ही मुश्किल है। जिनमें से सबसे पहले हैं समाज में छुट्टा घूमते कुछ ऐसे आसामाजिक लोग जो इस सामाजिक व्यवस्था में रहने लायक ही नहीं हैं। इनके साथ एक ही दिक्कत है कि ये अपनी खुद की बहन को छोड़ कर हर लड़की को बस 'एक' ही नज़र से देखते हैं। एक लड़की जो घर से कॉलेज या ट्यूशन और वहां से अपने घर जाती है। किस तरह एक ऐसे ही आवारा लड़के की वजह से उसका वो सब छूट जाता है, उसके सारे सपने एक तरफ रखे रह जाते हैं। हमने शायद ना ध्यान दिया हो पर हमारे चारों ओर समाज में रोज किसी लड़की के सपने सिर्फ इसी वजह से बलि चढ़ जाते हैं।

दूसरा अवरोध हैं स्वयं उस लड़की के माँ-बाप जिनकी सबसे बड़ी चिंता होती है उनकी बेटी, उसकी शादी, उसकी शादी का दहेज़।

एक नज़र में तो शायद माँ बाप का ये डर भी जायज़ लगे पर अंत में सारा बलिदान उनकी बेटी को ही देना पड़ता है, अपने सारे सपने भूल कर। आज भी देश के कई पिछड़े इलाकों में हालत तो ये है कि बेटी को सिर्फ इस वजह से ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता है कि कहीं उसके ज्यादा पढ़ जाने से उसके लिए दूल्हा ढूंढने में दिक्कत न हो।

अब माँ-बाप की ये चिंता सही है या गलत ये बता पाना या इस बारे में कुछ भी कह पाना मुश्किल है। पर हाँ इनमे से अधिकांश ऐसे हैं जिन्हे भरोसा दिलाया जाये कि समाज उनकी बेटी के साथ है, उनकी बेटी सुरक्षित है तो वो अपना फैसला बदल भी सकते हैं और ये काम सिर्फ देश की सरकार द्वारा ही संभव है।

'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना बेशक बहुत अच्छी है पर उनकी मानसिकता में किस तरह बदलाव लाया जायेगा जो एक बेटी के माँ-बाप हैं और खुद अशिक्षित हैं। सरकार के सामने एक और चुनौती है उन माँ-बाप के रूप में जो खुद पढ़े-लिखे हैं पर अपनी बेटी के लिए उसके पैदा होने से लेकर उसके बड़े होने तक बस एक ही सपना पूरी शिद्दत से देखते हैं, उसकी शादी का सपना। उनके उस सपने के आगे बेटी की खुशियां, बेहतर भविष्य, उसके सपने कोई मायने नहीं रखते।

अगर सरकार सही मायनों में देश की बेटियों को आगे बढ़ते देखना चाहती है तो उसे ऐसे 'चिंताग्रस्त' माँ-बाप की समस्या का कोई समाधान करना होगा। क्योंकि अगर यही हाल रहा तो शायद देश फिर किसी किरण बेदी, कल्पना चावला, साइना नेहवाल, चंदा कोचर, अरुन्धति भट्टाचार्या के लिए तरस जायेगा। उन माँ-बाप को समझाना होगा कि शादी, दहेज़, दूल्हे के आगे भी कई बेहद अच्छे सपने हैं उनकी बेटी के लिए...

Tuesday, 27 January 2015

समाज और पत्रकार

 मेरे लिए दिल्ली आना एक तरह से आकस्मिक ही था। आकस्मिक इसलिए क्योंकि मुझे खुद भरोसा नहीं था कि मैं यहां आईआईएमसी में बतौर छात्र पत्रकारिता सीखने पहुंच पाउंगा। पर ऐसा हुआ और यहां आने का असर कहा जाये या कुछ और एक पत्रकारीय समझ भी पैदा हुई। ग़ाज़िआबाद में दीदी के घर रहने का इंतज़ाम भी हो गया और रोज मेट्रो या बस से आते समय इधर उधर नज़र भी दौड़ने लगी। संस्थान में आने के बाद कई सेमिनार और बड़े बड़े समारोहों में  मौका मिलने लगा। इसी बीच संस्थान की ओर से ऐसे ही एक समारोह में जाने का मौका मिला। विषय था 'भारत में स्वयं के अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क की आवश्यकता'। लम्बी बहस चली और तमाम विशषज्ञों ने अपनी अपनी राय रखी। कुल मिलाकर जो निष्कर्ष निकला वो ये कि भारत में भी बीबीसी और सीएनएन की तरह एक सशक्त अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क होना चाहिए। बात सही भी थी।

            दिल्ली में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं इसी को लेकर सोशल मीडिया पर एक दिन एक टिप्पणी की। यूँ तो कई मुद्दों पर लेख लिखता रहता हूँ पर उनमें बहुत कम लोगों ने रूचि दिखाई क्योंकि उनमे से ज्यादातर ग़रीबी, अशिक्षा जैसे नीरस सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित थे। पर इस बार राजनीति ने अपना कमाल दिखाया और ऐसे लोगों की प्रतिक्रिया भी आई जिन्हे मैं जानता तक नहीं था। तर्क कुतर्क का सिलसिला बढ़ता चला गया और इसी बीच मेरे एक मित्र जो कि स्वयं लखनऊ स्थित एक अख़बार में कार्यरत हैं, उन्होंने कुछ पंक्तियाँ लिखीं कि, "हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाएँ दरबारों में, हम शब्दों की दीपशिखा हैं अंधियारे चौबारों में, हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं, डाकू को डाकू कहने की हिम्मत रखने वाले हैं।"

हालाँकि ये पंक्तियाँ तो पत्रकारिता का मूल मन्त्र हैं पर इतनी गंभीर टिप्पणी का उस हल्के राजनीतिक मुद्दे पर किया जाना कुछ अजीब सा लगा। यहां कहने का मतलब बस इतना सा है कि जब भी बात पत्रकारिता के उद्देश्यों की होती है तो ये चारों ओर से सिमट के बस राजनीति, सिनेमा और क्राइम तक सीमित हो जाती है। लेकिन ये वर्तमान में उद्योग बन चुकी 21वीं सदी की पत्रकारिता है। हमें ध्यान रखना होगा कि गरीबी, अशिक्षा, समाज जैसे मुद्दों का स्थान बस तभी तक है जब तक इसमें आम पाठक, दर्शक की रूचि इसमें होगी। पर सच यही है कि आम तौर पर ऐसे मुद्दों में आम लोगों की ही रुचि नहीं होती।

देश की 70 फीसदी आबादी अब भी छोटे शहरों और गांवों में रहती है जहाँ पत्रकारिता में बिना किसी प्रशिक्षण के स्थानीय लोग रख लिए जाते हैं। एथिक्स और पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेकर आये रिपोर्टर की जगह स्टिंगर से काम चलाया जाता है। वहां पत्रकारिता सर्कुलेशन और किसी तरह मुनाफा बढ़ाने का साधन भर है। एक ओर देश में अंतर्राष्ट्रीय मीडिया नेटवर्क की बात हो रही है तो वहीं सच यही है कि हमारी मीडिया राष्ट्रीय तो क्या ढंग से क्षेत्रीय और स्थानीय भी नहीं हो पाई है। इसे कालाहांडी, कोरापुट जैसे भुखमरी से पीड़ित इलाके, पूर्वोत्तर भारत, नक्सल समस्या जैसे मुद्दे नहीं दिखाई देते, जैसे वहां सब कुछ दुरुस्त है।

बहरहाल अपनी उस टिप्पणी से काफी कुछ सीखा। कुछ समझ में आया तो इतना कि गलती पत्रकारों की नहीं जो खबर के नाम पर कुछ भी परोस देते हैं। दरअसल राजनीति, सिनेमा, अपराध ये सारे ऐसे मुद्दे हैं जो पत्रकारिता के सामाजिक उद्देश्यों को बौना साबित कर देते हैं। हालाँकि उसके बाद से मैंने तय किया कि अब से कोशिश करूँगा कि उन मुद्दों को ही उठाऊं जो हमेशा ही अनदेखे किये गए। उस एक टिप्पणी ने मुझे एक संवेदनशील पत्रकार बनने को प्रेरित किया। या यूँ कहें कि एक 'सामाजिक पत्रकार'।

Wednesday, 21 January 2015

साहब… मैं ग़रीब हूं!

सर्दी का मौसम है। बड़े दिनों बाद अच्छी धुप खिली तो सोचा घर जाने से पहले थोड़ी खरीदारी कर ली जाये। जल्दी से दीदी को मनाया और पास के ही लाजपत नगर स्थित सेंट्रल मार्किट पहुंच गया। दीदी एक दुकान में जाकर कुछ खरीदने लगीं। मैं भी बाहर लगी दुकानों पर कुछ खरीदने लायक देखने लगा। तभी बाज़ार में घूमते हुए एक छोटी बच्ची दिखाई दी, उम्र यही कोई 8-9 साल रही होगी। अपना आधा जला हुआ दाहिना हाथ दिखाकर लोगों से पैसे मांग रही थी। कुछ देते तो कुछ ऐसे ही आगे बढ़ जाते। मैंने भी सोचा कि अभी चलते हुए इस बच्ची की कुछ मदद करूँगा। मैं दुकान के अंदर दीदी के पास वापस जाने लगा कि तभी एक छोटा लड़का आ के दुआएं देने लगा।

असल में वो भी कुछ पैसे चाहता था। पर जैसे ही उसकी तरफ देखा उसकी उम्र भी लगभग  ही रही होगी जितनी उस बच्ची की थी। उसका हाथ भी ठीक उतना ही जला हुआ था जितना उस बच्ची का। ये देख कर कुछ अजीब सा लगा। पास खड़े दुकान के सुरक्षाकर्मी से पुछा तो वो बोला, "अरे साहब बेवकूफ बनते हैं ये सब, कुछ हाथ वाथ नहीं जला है। प्लास्टिक गरम करके चिपकाते हैं  और फिर यही दिखा के पैसे मांगते हैं।"

ये सुन कर मैं दंग रह गया कि इतने छोटे बच्चे और ऐसे हथकंडे!
ये महज़ एक घटना मात्र नहीं थी। दरअसल ऐसी घटना से सामना सभी का हुआ होगा जब ऐसे ही किसी ग़रीब ने किसी मदद करने वाले की भावनाओं का मजाक बनाया हो। पर इसका ये मतलब नहीं कि ये पूरा ग़रीब समुदाय ही झूठा और धोखा देने वाला होता है। इंसान का स्वाभाव ही होता है दूसरे के दुःख को देखकर उसे अपना समझना, उसकी मदद करना। पर मदद पाने वालों में से कुछ इसी विश्वास और भावना का मजाक बना कर पूरी ग़रीब बिरादरी को अविश्वसनीय बना देते हैं।

राह चलते हुए ऐसे नज़ारे आम होते हैं जब एक ग़रीब बच्चा या गोद में बच्चा लिए हुए महिला किसी गाड़ी का शीशा ठोंक कर पैसे मांगते हैं पर प्रायः अंदर से मदद नहीं "आगे बढ़ो", "कुछ काम धाम क्यों नहीं करते", "पढ़ाई किया करो" जैसे कुछ शब्द ही बाहर आते हैं। क्या ये शब्द इस ग़रीब समुदाय पर घटते भरोसे का ही नतीजा तो नहीं हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हम कथित 'संपन्न' लोग किसी मॉल में 200 रुपये का पिज्ज़ा खाने के लिए 30-40 रुपये टैक्स तो दे देते हैं पर एक ग़रीब की मदद करने के लिए 5-10 रुपये नहीं होते। यहां कहने का मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि भिक्षावृत्ति को बढ़ावा दिया जाये। यहां बात घर में काम करने वाले नौकर चाकर या किसी असल ज़रूरत मंद की है।

ऐसा नहीं है कि हर भीख मांगने या मदद मांगने वाला ज़रूरत मंद ही होता है। कई मामलों में ये संगठित रूप से भी होता है। बाकायदा रोड, बाजार और रेड लाइट का बंटवारा होता है। ऐसा कई बार सामने भी आया जब ऐसे मामलों में कुछ गिरफ्तारियां हुईं और उन पर जबरन भीख मंगवाने का मामला 'अनैतिक मानव तस्करी (निषेध) ऐक्ट' के तहत दर्ज किया गया।

साफ़ है कि ये पता लगाना बेहद मुश्किल होता है कि कौन असली ग़रीब है और कौन झूठा। लेकिन हमें कुछ मुट्ठी भर झूठे लोगों की वजह से इस पूरे समुदाय को शक की निगाह से नहीं देखना चाहिए। हमें अपन मदद करने का मानवीय गुण बरक़रार रखना चाहिए। पैसे न सही पर खाना और कपड़ा देकर हम किसी 'असली' ज़रूरतमंद की मदद कर उसके चेहरे पर मुस्कान और होठों पर अपने लिए दुआएं तो ला ही सकते हैं। 
हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि हर ग़रीब झूठा नहीं होता और हर इंसान सच्चा नहीं होता है।

ग़रीब भी तो एक इंसान है!

Thursday, 15 January 2015

आओ 'मौत' छलकाएं...

हमारे देश में लोगों के बीच एक आम भावना सी है कि ग़रीब की जान की कीमत नहीं होती। साथ ही आये दिन ऐसे कई मौके भी आते रहते हैं जिससे ये धारणा और प्रबल होती है। एक बार फिर इन्ही गरीबों की जान जहरीली शराब के बहाने ही सही, चली गयी। यूपी की राजधानी लखनऊ में हुए हादसे में जहां 38 लोगों की मौत हुई वहीं करीब 100 से ज्यादा अब  भी अस्पताल में भर्ती हैं। इससे पहले 2013 में आजमगढ़ में भी ऐसा ही हादसा हुआ था जिसमें एक अनुमान के मुताबिक 42 लोगों की जान चली गयी थी। जहरीली शराब से मौत की घटनायें कोई नई नहीं हैं। तमिलनाडु, पंजाब, बंगाल, ओडीशा, यूपी, एमपी जैसे राज्यों में आये दिन ऐसी घटनायें होती रहती हैं।


एक रिपोर्ट के मुताबिक 'देसी दारु' के नाम से ग्रामीण इलाकों में मिलने वाली ये सस्ती शराब बेहद खतरनाक रसायनों को मिलाकर तैयार की जाती है। इसकी गंध बरक़रार रखने के लिए इसमें कीटनाशक तक का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इतना सब होते हुए भी, इतनी मौतों के बाद भी इस पर कोई रोक नहीं होती, जबकि इस पर रोक के लिए कई सख्त प्रावधान मौजूद हैं। जब कभी भी ऐसी कोई घटना होती है तो कार्रवाई के नाम पर कुछ अफसरों को सस्पेंड कर कर्तव्य निभा लिया जाता है। जबकि यह सब पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे होता है।

असल में पुलिस की अवैध कारगुज़ारियों की कई मदों में से एक मद देसी दारु के कारखाने चलाने वालों से वसूली भी है। लिहाज़ा कभी कार्रवाई ही नहीं की जाती। जब कभी ऐसी कोई घटना होती है तब कुछ चुनिंदा अफसरों और कर्मचारियों को निशाने पर ले लिया जाता है। पर सवाल वही है कि क्या ग़रीब की जान इतनी सस्ती है।

यूपी की बात करें तो यहाँ हर छोटे बड़े शहर के ग्रामीण इलाकों में 'कच्ची' या 'देसी' के नाम से धड़ल्ले से ये जहरीली शराब बनायी और बेची जाती है। शाम को शराब के आदी ऐसे ग़रीब मजदूर, ठेला-रिक्शा खींचने वाले जो महंगी शराब नहीं खरीद सकते वो ऐसे 'ठेकों' का रुख करते हैं जहाँ ये 'कच्ची' दारू 10 से 20 रुपये में आराम से मिल जाती है। यही बचत करने की सजा कभी कभी उन्हें और उनके घर वालों को भुगतनी पड़ जाती है।
लेकिन यही हमारा शासन-प्रशासन है जहाँ ग़रीब की जब मूलभूत आवश्यकताओं को ही अनदेखा किया जाता है तो उसकी 'लग्ज़री' पर इतना ध्यान देने का समय किसके पास है। कौन इतनी ज़हमत उठाये कि उन ठेकों और कारखानों पर कार्रवाई करे जो सस्ते नशे के नाम पर मौत परोसते हैं।

लखनऊ में इतने बड़े हादसे के बाद भी भविष्य में अगर राज्य सरकारें और प्रशासन इसी तरह सोते रहे तो निश्चित तौर पर ये आखिरी घटना नहीं होगी। अभी और नशे के आदी ग़रीब मजदूर अपनी जान गंवाएंगे।

Saturday, 3 January 2015

छात्र जीवन और विचारधारा

हमारे जीवन में उम्र के कई पड़ाव आते हैं जिनका अपना अलग अलग महत्त्व होता है। जीवन के पहले पड़ाव यानि बचपन में हम जहां सीखने की अवस्था में होते हैं तो वहीं एक समय बाद जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव यानि युवावस्था तक हम काफी कुछ सीख चुके होते हैं। ये एक ऐसी उम्र होती है जहाँ हम में ऊर्जा का भंडार होता है। हम जो चाहे उसे पाने की हिम्मत रखते हैं। ये अमूमन 20-25 साल की वो उम्र होती है जब हम अपने छात्र जीवन के आखिरी पड़ाव पर होते हैं। यही वो अवस्था होती है जहाँ से सीखे हुए की छाप भविष्य के हमारे हर काम में दिखाई देती है।

इन्हीं छात्रों में से कई आगे चल के देश का नेतृत्व करते हैं और अपने देश के इतिहास में इसके कई उदाहरण भी हैं। लेकिन इधर कुछ सालों में काफी कुछ बदला है। अब कॉलेज, विश्वविद्यालय और बड़े बड़े संस्थान विचारधाराओं के टकराव का अखाड़ा बन कर उभरे हैं। छात्रों के बीच बहस भी बौद्धिक स्तर से ज्यादा इस तरह की होती है जैसे 2 विरोधी दलों के प्रवक्ताओं की।

वर्तमान की बात करें तो कट्टरतापूर्ण ढंग से धर्म या संस्कृति, संस्कारों की बात करने वाले 'संघी', इनका विरोध करने वाले 'कांग्रेसी', ईमानदारी को लेकर भ्रम में रहने वाले और इन दोनों की आलोचना करने वाले 'आपी' कहलाये जाने लगे हैं। इन सबसे भी हास्यास्पद उन लोगों की स्थिति है जो खुद को कम्युनिस्ट या साम्यवादी विचारधारा का बोलते हैं और उपरोक्त सभी की आलोचना करते हैं पर एक वैकल्पिक विचार या योजना के नाम पर हमेशा से ही मौन रहे हैं।

कहा जाता है कि एक शिक्षक छात्रों के भीतर एक सुन्दर व्यक्तित्व का निर्माण करता है, एक ऐसा व्यक्तित्व जो दूसरों के लिए आदर्श होता है। पर उस स्थिति में क्या जब एक शिक्षक ही साम्यवाद की आड़ में और शिक्षक-छात्र के बीच की खाई को मिटाने के नाम पर शराब के जाम लड़ाए, हाथ में विलायती दारू और सिगार लेकर मार्क्स-लेनिन का ज़िक्र करते हुए उन ग़रीब नक्सलियों की बात करे जो स्वयं बीहड़ों में रहते हैं।

आख़िर क्या कारण हैं जो ये छात्र महज़ कुछेक संकुचित विचारधाराओं तक सीमित होते जा रहे हैं। इसका कारण काफी हद तक अलग अलग विचारधाराओं में बंटे शिक्षण संस्थान, वहां मौजूद पूर्वाग्रही वातावरण, शिक्षक और उससे भी ज्यादा देश की पूर्वाग्रही मीडिया है। इसलिए छात्रों को एक अच्छा व्यक्ति बनने के लिए ज़रूरी है कि वो खुद को किसी एक विचारधारा तक सीमित होने से बचाएं क्योंकि अब ना ही जेपी वाली ईमानदार समाजवादी विचारधारा जैसी विचारधाराएं रहीं और ना ही उनका प्रचार करने वाले ईमानदार प्रचारक। हां पुछल्ली राजनीति के जरिये राजनीतिक जीवन शुरू करने के लिए किसी एक विचारधारा में बंध जाना फायदेमंद हो सकता है।

Friday, 2 January 2015

समाज का बनावटीपन

देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध कोई नई बात नहीं है। कभी कहीं कोई लड़की किसी की हवस का शिकार होती है, कहीं कोई शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना का तो कहीं कोई किसी की नफ़रत का। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध एक ऐसा जिस पर तमाम बहसें होती रहती हैं। एक ओर जहाँ समाज का बुद्धिजीवी वर्ग इस विषय के प्रति बेहद गंभीर होता है, तो वहीं समाज के आम नागरिक यानि हम लोग भी कभी किसी बहस में या ऐसी कोई घटना होने पर सुबह हाथ में चाय का कप और ब्रेड बटर ले कर कुछ समय की गंभीरता दिखा लेते हैं। हम लोग ही ऐसी घटनाओं के होने पर कैंडल मार्च निकाल लेते हैं और बहुत हुआ तो एक दमदार विपक्षी दल की तरह सरकार की जम कर आलोचना भी कर डालते हैं।

लेकिन प्रश्न यही है कि क्या ये सब महज़ दिखावा तो नहीं? क्या हम लोग महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों के विरुद्ध और समाज के नैतिक पतन के विरुद्ध सच में गंभीर हैं। ये सवाल इसीलिए है क्योंकि कुछ दिन पहले दिल्ली में एक महिला डॉक्टर पर एसिड फेंका गया। ये घटना तो दुखद थी ही पर सीसीटीवी कैमरे में कैद हुए बाद के दृश्यों ने इस कथित संवेदनशील समाज का एक अलग ही चेहरा दिखाया। उन दृश्यों में महिला डॉक्टर घटना के बाद दर्द से कराहते हुए वहीं पास से गुजरती दो महिलाओं से मदद मांगती दिखी पर वो आगे बढ़ गयीं बाद में एक व्यक्ति ने अपने घर से बाहर आकर उस महिला को पास के अस्पताल पहुंचाया।

ये सब देख कर अफ़सोस इसलिए ज्यादा हुआ क्योंकि मुँह फेर कर जाने वाली भी महिलाएं थीं। असल में जीवन की इस भागदौड़ में हम इतने मतलबी हो गए कि हमारे बीच इंसानियत का रिश्ता ख़त्म सा हो गया। समाज की यही बेरुखी 2 साल पहले निर्भया मामले में भी दिखाई दी थी जब अपराधियों ने उसे सड़क पर फेंक दिया पर काफी देर तक उसे उठा के अस्पताल तक पहुँचाने वाला कोई नहीं था । आज कहीं किसी गली, रोड, बस, ट्रेन, कॉलेज में कोई लड़की जब छेड़छाड़ का शिकार होती है तो वहां उसके लिए बोलने वाला कोई नहीं होता। फिर वो कोई दूर दराज का छोटा शहर या क़स्बा हो या फिर दिल्ली जैसा मॉडर्न मेट्रो शहर।


आखिर क्यों हम उस दिन का इंतज़ार करते हैं जब यही सब हमारी बहन, बेटी या दोस्त के साथ हो। इन अपराधों को करने वाले अपराधियों की हिम्मत शिकारी बिल्ली जितनी ही होती है। ज़रा सा पैर पटकने पर जैसे वो भाग जाती है बिलकुल उसी तरह इनकी हिम्मत तोड़ने के लिए तेज से उठी एक आवाज़ ही काफी होती है। लेकिन उस समय हम इनसे भी ज्यादा कमज़ोर हो जाते हैं।

आज ज़रूरी ये नहीं कि सिर्फ बड़े बड़े कानून ही बनाये जाएँ। असल में इन कानूनों के साथ ज़रूरी ये भी है कि हम अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी समझें। एक लड़की जब ऐसी छींटाकशी या छेड़छाड़ का शिकार होती है तो उसकी मदद को आगे आएं और जो मदद को आगे आता है उसका साथ दें। कहा भी जाता है कि अपने लिए तो सिर्फ जानवर जीते हैं, इंसान दूसरों के लिए जीता है। तो क्यों ना हम इंसान होने का थोड़ा सा फ़र्ज़ अदा करें।