पिछले कई दिनों से सेंसरशिप को लेकर जो बहस चल रही थी उसमें एक नया अध्याय सुप्रीम कोर्ट के आईटी एक्ट की धारा 66ए को हटाने के साथ ही और जुड़ गया। बेशक ये अच्छा फैसला है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक भी था, क्योंकि अब समाज में अधिकांश बहसें सोशल मीडिया के द्वारा ही होती हैं। ऐसे में बेहद ज़रूरी था कि इंटरनेट के माध्यम से उभर रहे नए आलोचक वर्ग को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त हो। इस फैसले के साथ ही अब तानाशाही मानसिकता के उन लोगों को भी कुछ समझ में तो जरूर आएगा जो शासन सत्ता के हाथ में आते ही खुद को 'खुदा' समझ बैठते हैं।
लेकिन इन सबके बावजूद समाज को और देश में तेजी से उभर रहे बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। क्योंकि जहाँ एक ओर हर चीज को सेंसर करना उचित नहीं है, वहीं दूसरी ओर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर कुछ भी परोसना भी कहीं से ठीक नहीं है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संवैधानिक अधिकार उस जगह आकर ख़त्म हो जाते हैं जहाँ से किसी दूसरे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की शुरुआत होती है। इसीलिए ये ज़रूरी है कि हमें अपनी सीमाओं और नैतिकता का बखूबी ज्ञान हो।
हाल ही में यूपी के बरेली में एक छात्र को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि कथित तौर पर उसने यूपी के एक 'बेहद' महत्वपूर्ण काबीना मंत्री के ख़िलाफ़ फेसबुक पर कुछ टिप्पणी की थी, अब चूंकि 66ए के तहत गिरफ़्तारी का रास्ता खुला था सो उसे गिरफ्तार कर लिया गया, इसके अलावा असीम त्रिवेदी और बाल ठाकरे के निधन पर मुंबई बंद के खिलाफ टिप्पणी करने वाली छात्राओं समेत कई ऐसे मामले हैं जिनमें समय समय पर लोगों को इस धारा के तहत गिरफ्तार या बेवजह परेशान किया गया।
अब ये धारा नहीं है तो गिरफ्तारियां तो नहीं होंगी, अभिव्यक्ति की आज़ादी भी सुरक्षित रहेगी पर क्या ये अब अराजकता को बढ़ावा नहीं देगा, ये एक दूसरा पहलू हो सकता है। ऐसी स्थिति में समाज को खुद इतना समझदार होना पड़ेगा की वो ये तय करने की स्थिति में हो सके कि क्या सही है और क्या गलत। ऐसा इसलिए क्योंकि जब भी किसी फिल्म या ऐसी ही किसी चीज पर बैन को लेकर याचिका सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में पड़ी, अधिकांश में हर बार कोर्ट ने यही कहा कि समाज खुद समझदार है आप उसे ही तय करने दीजिये कि उसे क्या देखना है और क्या नहीं।
ऐसे में ये साफ़ है कि ज़िम्मेदारी हमारी ही है कि हम किस तरह की सामग्री दुनिया के सामने रख रहे हैं। क्योंकि कुछ भी हो समाज को तो बैन नहीं किया जा सकता ना!
लेकिन इन सबके बावजूद समाज को और देश में तेजी से उभर रहे बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। क्योंकि जहाँ एक ओर हर चीज को सेंसर करना उचित नहीं है, वहीं दूसरी ओर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर कुछ भी परोसना भी कहीं से ठीक नहीं है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारे संवैधानिक अधिकार उस जगह आकर ख़त्म हो जाते हैं जहाँ से किसी दूसरे व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों की शुरुआत होती है। इसीलिए ये ज़रूरी है कि हमें अपनी सीमाओं और नैतिकता का बखूबी ज्ञान हो।हाल ही में यूपी के बरेली में एक छात्र को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि कथित तौर पर उसने यूपी के एक 'बेहद' महत्वपूर्ण काबीना मंत्री के ख़िलाफ़ फेसबुक पर कुछ टिप्पणी की थी, अब चूंकि 66ए के तहत गिरफ़्तारी का रास्ता खुला था सो उसे गिरफ्तार कर लिया गया, इसके अलावा असीम त्रिवेदी और बाल ठाकरे के निधन पर मुंबई बंद के खिलाफ टिप्पणी करने वाली छात्राओं समेत कई ऐसे मामले हैं जिनमें समय समय पर लोगों को इस धारा के तहत गिरफ्तार या बेवजह परेशान किया गया।
अब ये धारा नहीं है तो गिरफ्तारियां तो नहीं होंगी, अभिव्यक्ति की आज़ादी भी सुरक्षित रहेगी पर क्या ये अब अराजकता को बढ़ावा नहीं देगा, ये एक दूसरा पहलू हो सकता है। ऐसी स्थिति में समाज को खुद इतना समझदार होना पड़ेगा की वो ये तय करने की स्थिति में हो सके कि क्या सही है और क्या गलत। ऐसा इसलिए क्योंकि जब भी किसी फिल्म या ऐसी ही किसी चीज पर बैन को लेकर याचिका सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में पड़ी, अधिकांश में हर बार कोर्ट ने यही कहा कि समाज खुद समझदार है आप उसे ही तय करने दीजिये कि उसे क्या देखना है और क्या नहीं।
ऐसे में ये साफ़ है कि ज़िम्मेदारी हमारी ही है कि हम किस तरह की सामग्री दुनिया के सामने रख रहे हैं। क्योंकि कुछ भी हो समाज को तो बैन नहीं किया जा सकता ना!






